मंगलवार, 21 नवंबर 2017

विवाह संस्कार -नियमावली बिना अधूरा -कैसे जानें -झा "मेरठ "

प्राचीन पद्धति में विवाह संस्कार  छे प्रकार के होते हैं | वर्तमान पद्धति में दो प्रकार के होते हैं | पहला -वर वधु  का चयन माता पिता करते हैं | दूसरा -वर या वधु खुद चयन करते हैं | ----अगर हम पहला प्रयोग देखें -तो माता पिता जिस  वर या वधुओं  का चयन करते हैं -उसमें सामाजिकता ,संस्कृति और देवप्रिय की बात प्रथम होती है -जो सुखद अनुभूति देती है | दूसरा -जो वर या वधु अपने अपने योग्य चयन करते हैं -उसमें -सुंदरता ,अपना सुख और भौतिक लाभ की बात विशेष रहती है--- किन्तु स्थिरता के लिए  जिसमें दोनों के माता पिता की सहमति और समाजितकता का उपयोग होता है ---उस विवाह को सनातन संस्कृति में वर और वधु दोनों को कुछ नियमावली का पालन करना होता है | विवाह चाहे खुद के चयन से हो या माता पिता की सहमति से --नियमावली के बिना अटूट सम्बन्ध संभव नहीं है और यह खुद वर वधु को निभाना भी होता है | ----ध्यान दें --विवाह संस्कार के आयोजन में सगे -सम्बन्धी ,माता पिता ,क्षण मात्र के सहयोगी होते हैं | वास्तव में दो आत्माओं का मिलन और सुखद अनुभूति के लिए दोनों के बीच एक लकीर होती है जिस सीमा का मान करने से जीवन सुखद रहता है और इसके उलंघन से जीवन दुःखद बन जाता है | -----शरीर का देहावसान जब होता है तो अग्नि में ही समाहित होता शरीर चाहे वर हो या वधु इसीलिए प्रत्येक वर वधु अग्नि की ही शपथ लेते हैं और अग्नि की ही परिक्रमा करते हैं | आप अपनी वाक पटुता से लोगों को तो भर्मित कर सकते हैं किन्तु अग्निदेव को नहीं भ्रमित कर सकते हैं | -आइये जानते हैं -विवाह की वो बात जिसका मान दोनों को रखना होता है कसमें भी खाते हैं पर क्षणमात्र में इन बातों को विस्मृत भी कर देते हैं --जो नहीं करना चाहिए ----1 -प्रत्येक यज्ञ ,पूजा ,पाठ ,हवन दोनों मिलकर करें और सहमति से करें | 2 ---प्रत्येक व्यक्ति को दान अवश्य करना चाहिए किन्तु समर्थ के अनुसार करें | 3 -एक दूसरे की देखभाल दोनों को करनी चाहिए | 4 -घन ,  की जानकारी दोनों को होनी चाहिए ,साथ में विचार अवश्य मिलने चाहिए | 5 --संपत्ति -वाहन -यात्रा में सहमति अनिवार्य है | 6 --दोनों प्राणी को छे ऋतुओं का आनन्द अवश्य लेने चाहिए | 7 ---आपस की कटुता को एकान्त में दोनों को खुद सुलझाना चाहिए साथ ही इस बात की जानकारी माता पिता को भी नहीं होनी चाहिए | ---ध्यान दें इसे ही अग्नि के सात फेरे कहते हैं | इन बातों का उलंघन दोनों को नहीं करनी चाहिए | ---यहाँ -वधु को कुछ और नियमावली का पालन करना होता है ---उद्यान में भ्रमण ,मद्यपान करने वाले व्यक्ति के साथ ,पिता के यहाँ जाना हो तो पति की सहमति अवश्य होनी चाहिए | घर में प्रवेश करते ही उन सभी बातों माननी चाहिए जो धर्म सम्मत हों यानि जिनसे किसी को कष्ट न हो ---तो वास्तव में जीवन सुखद रहता है यहाँ भी सुख मिलता है | परमात्मा की भी कृपा बनी रहती है | -आगे की चर्चा आगे करेंगें |आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा "मेरठ "दोस्तों आप भी अपनी -अपनी राशि के स्वभाव और प्रभाव को पढ़ना चाहते हैं या आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलतीं हैं कि नहीं परखना चाहते हैं तो इस पेज पर पधारकर पखकर देखें - https://web.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri

सोमवार, 20 नवंबर 2017

विवाह के लिए संस्कार क्यों -पढ़ें? झा "मेरठ "

कर्मकाण्ड जगत में प्रत्येक व्यक्ति को षोडश संस्कारों गुजरना होता है | सभी संस्कारों के अलग -अलग महत्त्व हैं | विवाह संस्कार प्रत्येक व्यक्ति का दशवां संस्कार होता है | इस विवाह संस्कार के बाद प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने सुखों से वंचित होते जाते हैं | विवाह संस्कार प्रत्येक व्यक्ति का एक सुखद संस्कार है | ज्ञानी पुरुष अपनी जिम्मेदारी की पूर्ति कर वैराग की ओर चलने लगते हैं | अज्ञानी पुरुष विवाह संस्कार के बाद मोह माया में विशेष रम जाते हैं | ---वास्तव में संसार के प्रत्येक व्यक्तियों का  विवाह संस्कार एक सुखद संस्कार होता है जिसे हर्षोल्लास से मनाते हैं और मनाने भी चाहिए किन्तु --ब्राह्मणों  {द्वीज }का विशेष खुशी का संस्कार यज्ञोपवीत संस्कार होता क्योंकि इस संस्कार के बाद जो अलौकिक ज्ञान गुरुजनों के सान्निध्य में मिलता है --उस ज्ञान की वजह से द्विज केवल माता पिता की मर्यादा का पालन करने हेतु विवाह संस्कार में बंधते हैं --इसलिए ब्राह्मणों का विवाह संस्कार अति सरल और भव्यता विहीन होता है किन्तु मन्त्रों की विधियों की अत्यधिकता होती है | पर आज इस बात का भान ही नहीं होता --जिस कारण से विवाह संस्कार में कहीं कोई न तो अंतर दिखता है न ही किसकी शादी हो रही है इसका पत्ता रंग रूप से दिखता है | अगर दिखती  है तो विवाह की भव्यता | -----अब सबसे पहले यह समझें कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी बेटी दूसरे को देता है और दूसरे की बेटी को खुद स्वीकार करता है | क्यों --?--क्योंकि एक तो इस प्रक्रिया से समाज का विस्तार होता है, प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से जुड़ते हैं ,प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के सुख -दुःख में सहभागी बनते हैं -साथ ही अत्यधिक धन खर्च और परिश्रम भी करते हैं | दूसरा ---यदि यह प्रक्रिया नहीं हो तो प्रत्येक व्यक्ति जानवरों की भांति अपने -अपने घरों में सिमट कर रह जायेंगें | न माँ का न बहिन का न ही किसी संबंधों जान पायेंगें न ही इंसान बन पायेंगें | यही विवाह एक ऐसा संस्कार है --जो प्रत्येक व्यक्ति को जीने का ढंग सीखता है ,उसको एक सामाजिक प्राणी बनाता है साथ ही आने वाली पीढ़ी को एक नियमावली बताता है | अतः प्रत्येक व्यक्ति को इस बात पर विचार करना चाहिए ---न कि मदोन्मत होकर वही बोलना या करना चाहिए जो न तो आपको सुख दे पाए न ही समाज की प्रेरणा बन सके | ----आगे की चर्चा आगे करेंगें |
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विद्याअध्ययन संस्कार-क्यों -पढ़ें !झा "मेरठ "

या विद्या सा विमुक्तये --वास्तवित बात तो यह विद्या ऐसी होनी चाहिए जो लोभ ,अर्थ ,काम, मोह का परित्याग कराकर मोक्ष की ओर ले चले | धयान दें ---जब आप उत्तम शिक्षा की प्राप्ति करते हैं तो उत्तम पद और उत्तम धन की जिज्ञासा अवश्य रखेंगें | जब आप उत्तम भवन की नींव रखते हैं तो भवन को भव्य अवश्य बनायेंगें | ठीक इसी प्रकार से जब उत्तम संतान की कामना करते हैं तो शिक्षा भी उत्तम होनी चाहिए | पर जिस विद्याध्ययन संस्कार का प्रतिपादन मह्रषियों ने किया उस विद्याध्ययन के लिए माता पिता परिजनों के साथ साथ उत्तम रहन -सहन का भी त्याग करना होता है तभी अलौकिक विद्या प्रभाव दे पाती है | यहाँ से दो मार्ग शुरू होते हैं सभी जातकों के -{1 }पहला -संसार में जीने हेतु या जीवन को समझने हेतु लौकिक विद्या का ज्ञान अनिवार्य है --इसके लिए किसी भी  चीज का त्याग करना अनिवार्य नहीं होता बल्कि केवल समझना अनिवार्य होता है | {2 }यह संसार मोह माया से लिप्त है और जो इस धरा पर आया है उसे जाना भी होगा तो ज्ञानी पुरुष संसार चक्र से निकलने हेतु अलौकिक विद्या के साथ -साथ अलौकिक जीवन जीते हैं साथ ही दूसरे को भी इस मार्ग का अवलोकन भी कराते हैं | --यहाँ भी कोई भेद -भाव नहीं है बल्कि -जो अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति करेगा -उसे यज्ञोपवीत धारण करना होगा --क्योंकि ब्रह्म सूत्र को धारण करने वाला ही ब्रह्म को जान सकता है ---इसके साथ -साथ -संध्या -गायत्री के जाप ,सही दिनचर्या का पालन करेगा ,आचार -विचार के प्रति सजग रहेगा ,संसारिक उन्हीं वस्तुओं को अपनायेगा जो सत मार्ग पर ले जाने लायक होगी तभी -वेद वेदान्त ,पुराण ,शास्त्रों को पढ़ेगा ---ऐसा बनकर ही सभी लोगों का प्रिय हो पायेगा | -----जो सांसारिक अन्य कार्यों से जुड़ेगा उसे केवल अपने -अपने मार्गों का चयन करना होगा साथ ही सांसारिक सभी वस्तुओं से लिप्त होगा ,उसे किसी वस्तु का त्याग नहीं करना होगा बल्कि उसे केवल एक सतगुरु की बातों को अमल करनी होगी ---उन गुरु की कृपा से मोह माया में रहकर भी परमात्मा की प्राप्ति करेगा | -----यहाँ ध्यान दें ---वैरागी व्यक्ति ही अलौकिक विद्या की प्राप्ति कर सकता है और सक्षम व्यक्ति {तन -मन -धन }ही उस विद्या से लाभ प्राप्त कर सकता है ----यहाँ दोनों चीजें दोनों के पास नहीं हो सकती है अगर है तो निष्फल हो जाएगी साथ ही फिर एक दूसरे से कोई जुड़ा भी नहीं रह सकता है --इसलिए इस विद्या अध्ययन संस्कार की जरुरत होती है|आगे की चर्चा आगे करेंगें ----आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा "मेरठ "दोस्तों आप भी अपनी -अपनी राशि के स्वभाव और प्रभाव को पढ़ना चाहते हैं या आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलतीं हैं कि नहीं परखना चाहते हैं तो इस पेज पर पधारकर पखकर देखें - https://www.facebook.com/kanhaiyala...

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

इस पक्ष की भविष्यवाणी को परखकर देखें -19 से 3 -12-17 तक --झा "मेरठ "

संवत 2074 यानि मार्गशीर्ष {अगहन }शुल्क पक्ष 19 /11 /2017 से 03 /12  /2017 तक की भविष्यवाणी की बात करें तो पहले प्रमाण पर गौर करें --"धने मीने बुधोयाति मारयति मृगान गजान ,प्रजा शाशकयोरवैरम करोति विग्रहं तदा "-----अर्थात -शनिदेव के साथ धनु राशि का बुध होने से जंगली जानवर -मृग ,हाथी ,शेर ,चीते ,पशु -पक्षी यानि समस्त जीवजन्तुओं को क्षति करेगा | राजा -प्रजा में परस्पर वैर -विरोध होगा | नेता एक- दूसरे पर कीचड़ उछालने में निरंतर लगे रहेंगें | धार्मिक उन्माद को बढ़ावा मिलेगा | असामजिकतत्व आतंकी कुकृत्यों में लगे रहेंगें | पश्चिमी देशों पर शनि की दृष्टि के कारण हिंसक उपद्रव होंगें | खाड़ी के देशों में युद्ध का षड्यंत्र रचा जायेगा | कश्मीर के मामलों में सावधानी हितकर रहेगी | ईसा -मूसा की कसमकश चलती रहेगी | विश्व शान्ति के प्रयास निष्फल हो सकते हैं | --तेजी मन्दी की बात करें तो ---तिथि अल्प और वृद्धि के कारण गिरावट देखने को मिलेगा | --प्रमाण --जेहि पखवारे तिथि बढे ,वाहि में घट जाय ,सभी वस्तु मन्दी बिकें मंहगाई हट जाय "अर्थात -पक्ष के मध्य अनिश्चित भाव देखने को मिलेंगें | ---वृश्चिक का शुक्र अनाज ,मूंगफली ,चाय ,काफी ,ऊनी वस्त्रों में तेजी कर सकता है | शेयर -सर्राफा -सट्टा बाजार में घट -बढ़ चलेगी | ---आकाश लक्षण की बात करें तो --पक्षांतर्गत घामाछाई सी चलेगी | सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में न्यूनाधिक वर्षा ,हिमपात प्रभावित करेगी | भूकम्प ,भूस्खलन ,झंझाबात के चलते यातायात में बाधा पड़ेगी | कुघटना चक्र संभव है | पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी होने से कोहरा छाने से ठिठुरन बढ़ेगी | शीतलहर चलेगी | ---घन वा राजा धन वा देश ,जहँवा बरसे अगहन सेस "आप चाहे बालक हों ,युवा हों ,गृहस्थ हों चाहें बुजुर्ग हों ! सभी के योग्य यह पेज https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri है-- साथ ही एकबार फ्री ज्योतिष सेवा प्राप्त करें और ज्योतिष के ज्ञान के लेखों की नवीन गंगा में रोज डुबकी लगायें ।यकीं नहीं आता है तो शिकायत करें -09897701636 +09358885616 -आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस " {मेरठ -भारत }संचालक -पंडित -के ० एल ० झा शास्त्री {शिक्षा -दरभंगा ,मेरठ ,मुम्बई }

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

जनेऊ संस्कार में विरोधाभाष क्यूं है -पढ़ें !झा "मेरठ "

जनेऊ संस्कार में विरोधाभाष क्यूं है -पढ़ें !झा "मेरठ "कर्मकाण्ड जगत में -जनेऊ संस्कार अर्थात --चयनित मार्ग पर चलना हो तो प्रत्येक जातकों को द्वीज बनना होता है | जैसे प्रत्येक छात्रों को दशवीं कक्षा के बाद अपने -अपने विषयों का चयन करना होता है जो खुद ही करना होता है --अगर आप कर्मकाण्ड करना चाहते हैं तो वेद पढ़ें | अंग्रेजी विषय में -आर्ट पढ़ें | आप ज्योतिषी बनना चाहते हैं तो ज्योतिष विषय पढ़ें | अंग्रेजी के छात्र हैं -आर्ट या और भी विषयों का चयन कर सकते हैं | आपको पढ़ाना है या नौकरी करनी है तो संस्कृत के विषय -साहित्य या व्याकरण का चयन कर सकते हैं | अंग्रेजी में साइंस विषय का चयन करते हैं | अर्थात प्रत्येक बालकों को अपने -अपने मार्ग का चयन खुद ही करना होता है | ठीक इसी प्रकार से --जनेऊ ,या उपनयन संस्कार का शाब्दिक अर्थ है उपवस्त्र या विशेष प्रकार की क्षमता प्राप्त करने हेतु यह संस्कार होना चाहिए --इस संस्कार के बिना न तो कर्मकाण्ड जानने के न ही कराने के अधिकारी हो सकते हैं | सवाल यह उठ सकता है --कोई क्यों नहीं पढ़ सकता है तो --जो संध्यावंदन करेगा ,शिखा धारण करेगा ,धौत वस्त्र पहनेगा ,सात्विक भोजन करेगा ,निष्पक्ष और निःस्वार्थ ज्ञान प्रदान करेगा साथ ही अपना व्यवहार सरल और परमात्मा के साथ रखेगा वही कर्मकाण्ड करेगा या वेद -वेदान्त का अध्ययन करेगा अध्यापन करायेगा | इसलिए प्रत्येक यज्ञ में यजमान को भी द्विज बनना होता है तभी यज्ञ सफल होते हैं | यहाँ एक बात सोचें -अगर सभी द्विज बन जायेंगें या सभी राजा ही बन जायेंगें या सभी वैश्य ही बन जायेंगें तो सामाजिक सभी कार्य कैसे चलेंगें | एक व्यक्ति ने महर्षि से पूछा अगर कोई द्विज भगवान के पास निरंतर रहेगा तो भगवान तो केवल उनके ही होंगें ,तो महर्षि ने कहा कोई द्विज भगवान के पास 24 घण्टे रहेगा उसे पूजा करने से जितना पुण्य मिलेगा अगर समज का कोई भी कार्य करने वाला समाज के हित लिए कार्य करें और केवल भगवान का स्मरण या दर्शन दूर से भी एकबार कर लेगा तो उसको भी उतना ही पुण्य मिलेगा जितना द्विज को मिलेगा | तो फिर सभी को द्विज बनना उचित नहीं रहेगा | अतः समाज हित, देश हित ,विश्व हित के लिए सभी एक दूसरे के पूरक हैं न कि यहाँ कोई विरोधाभाष है | विरोधाभाष संस्कारों में नहीं हमारे व्यवहारों में है अतः उसे ठीक करना या ठीक से समझना हितकर रहेगा | आगे की परिचर्चा आगे करेंगें | 

सोमवार, 13 नवंबर 2017

आप बीती पर है सच्ची -मेरी आत्मकथा "झा -मेरठ "भाग -{32}

--अपनी जीवनी की अंतिम बातों को कहकर शब्दों को विराम देना चाहता हूँ | -जो मुझको जीवन में दुःख मिला यह मेरा प्रराब्ध था | जो मुझको सुख मिला या मिल रहा है यह भी मेरा कर्तव्य का परिणाम है | यद्यपि मैं सरकारी मान्यता प्राप्त भले ही एक शिक्षक नहीं बन पाया या एक उत्तम गायक नहीं बन पाया या एक पत्रकार नहीं बन पाया -पर एक शिक्षक की तरह से आपलोगों को सदा पढ़ाने की कोशिश की है ,जो भी भजनों को सुनाया है वो गायकी के लिए नहीं बल्कि परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए सुनाया है | आपलोगों के स्नेह के कारण  मैं भले ही अखबारों या चैनलों का पत्रकार नहीं बन पाया पर आपलोगों का भी मैं उत्तम पत्रकार हूँ | --ध्यान दें ---मेरे पास आज जितने संसाधन हैं सब परमात्मा की कृपा से है --कम से कम एकबार मैं किसी के काम आ सका तो मेरा जीवन धन्य होगा यही सोचकर सेवा करता हूँ | ---जो सेवा निःशुल्क हम दे रहे हैं -वो मेरी सोच है -जो धन हम विज्ञापन में खर्च करेंगें उन पैसों से आपतक ऐसी सेवा देकर पंहुचा जा सकता है | अगर मेरे जीवन में राहु बाल्य काल में न आया होता तो बुढ़ापा में आता- तो अच्छा हुआ जीवन की शुरुआत ही दुःखद रही आगे तो सुख मिलेगा | यह जीवन की लीला है प्रत्येक व्यक्ति को दुःख और सुख दोनों भोगने होते हैं | आज मेरे जैसा सौभाग्यशाली कौन होगा जिसको भोजन ,वस्त्र और भवन के सुख नहीं मिले उसको परमात्मा ने आधुनिक सभी संयन्त्रों का सुख दे रखा है | एक दुःख है -मेरठ मेरी कर्म भूमि है --अगर हम अपनी  कर्म भूमि का नाम विख्यात कर पाए तो मेरा जीवन धन्य हो जायेगा | अगर हम अपनी मातृभूमि मिथिला को सुखद उपहार दे पाए तो मेरा जीवन धन्य हो जायेगा | मेरी ज्योतिष निःशुल्क सेवा सच्चे मन से है जबतक लेखनी चलती रहेगी सेवा मिलती रहेगी | बहुत से लोग ये सोचते हैं सेवा लेने के बाद पेज को नापसंद करदेंगें --इससे क्या होगा -आप पेज को लाइक करें या न करें हम आपके दिलों को पसंद आना चाहते हैं न कि पेज पर --आप सभी लोगों ने मेरी जीवनी पढ़ी -आशा है -अपना -अपना धैर्य बनाये रखें साथ ही आप सभी ही तो मेरे परिवार हैं ---किसी के दो भाई और एक बहिन होती है मेरे तो अनंत भाई -बहिनें हैं आप सभी को मेरा नमन ---आपका पण्डित कन्हैयालाल झा शास्त्री -किशनपुरी धर्मशाला देहली गेट मेरठ सहायता सूत्र --09897701636 +09358885616फ्री ज्योतिष एकबार सेवा हेतु यहाँ पधारें ----https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri

रविवार, 5 नवंबर 2017

मुण्डन संस्कार क्यों होता है -पढ़ें !झा "मेरठ "

---सनातन संस्कृति में -मुण्डन संस्कार -छठा  संस्कार है जो प्रत्येक जातक एवं जातिकाओं के होते हैं | यह मुण्डन संस्कार भी भेद भाव रहित होता है साथ ही चाहे बालक हो या बालिका सभी के -एक वर्ष ,तीन बर्ष या फिर पांच वर्षों के होने पर अवश्य होते हैं | मुण्डन अर्थात बालों का परित्याग करना होता है किन्तु -अपने -अपने कुलदेवताओं के आशीर्वाद के बिना नहीं होता है न ही करना चाहिए | ---क्यों होता है --का जबाब है -जैसे किसी खेत में बढियाँ अनाज का उत्पादन करना है तो भूमि को खोदे बिना संभव नहीं है | इसी प्रकार से सभी शिशुओं के मस्तक में समस्त चीजें विद्यमान रहती हैं बिना मुण्डन किये उन समस्त चीजों को निखारा नहीं जा सकता है | यह मस्तक वास्तव में जितना दिखने में सरल लगता है उतना सरल है नहीं इस मस्तक के बालों का जितना मुण्डन होता रहेगा यह मस्तक उतना ही कठोर होता जाता है साथ ही शरीर के समस्त अवयवों को सुरक्षित और संचार प्रवाह देता रहता है | अगर इन बालों का कम से कम दो बार मुण्डन न हो तो वह व्यक्ति केवल एक दिशा गामी ही रहता है | अतः सृष्टि पर जब से ज्ञान मिला लोगों को मुण्डन अवश्य कराते हैं | ब्राह्मणों को तो निरन्तर मुण्डन कराते रहना चाहिए क्योंकि संसार में ज्ञान दाता तो भूदेव ही होते हैं अगर कोई मुण्डन नहीं करता है तो अलौकिक चीजों की जानकारी नहीं मिल पाती है या फिर अपने  मार्ग से भटक जाता है | कृपया ध्यान दें --जिनको ज्ञान की जरुरत है या जो अपना अस्तित्व को जानना चाहता है या जो परोपकारी होते हैं वो सदा मुण्डन अवश्य कराते हैं | --आपका एस्ट्रो वर्ल्ड हिन्दी सर्विस झा "मेरठ "दोस्तों आप भी अपनी -अपनी राशि के स्वभाव और प्रभाव को पढ़ना चाहते हैं या आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलतीं हैं कि नहीं परखना चाहते हैं तो इस पेज पर पधारकर पखकर देखें - https://www.facebook.com/kanhaiyalal.jhashastri

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